बुर्का, पर्दा, हिजाब

बुर्का, पर्दा, हिजाब

मौलाना आप के पास माचिस होगी?

मैं चोंका, यूँ कहिए कि चोंकने की एक्टिंग की.

जी… जी हाँ होगी_____मगर आप क्या जादूगर हैं?

मैं आंखे फैला कर हैरत की मूर्ति बन गया। “जादूगर” उन्होंने सवालिया नज़रों से मुझे घोरा। “और नहीं तो क्या.

आपको भला कैसे मालूम हुआ कि मैं मौलाना हूं?मेरे इस साइंटिफिक तर्क पर पल भर के लिए वह(प्रोफेसर सहयात्री) चकित रह गए मगर मेरे चेहरे से उस समय शायद हिमाकतों का फव्वारा उबल रहा था,

उनका आश्चर्य अगले ही लम्हे उपहासास्पद दिलचस्पी में बदल गया और उनके साथ वाली लड़की(नरगिस) के चेहरे पर भी इस्तिहज़ाई मुस्कुराहट खेलने लगी।

” ओह……….दर असल मुझे कियाफा शनासी (चेहरा पढ़ना, physiognomy) में महारत है,

आप की दाढ़ी सौ फीसद किसी मौलाना ही की दाढ़ी हो सकती है।

“”……………अरररर …” मैं ने बोखलाहट के अंदाज़ में इस तरह दाढ़ी को मुठ्ठी में पकड़ा जैसे उस के होने पर शर्मिंदा हूँ अब मेरी हिमाक़त (मूर्खता) में चार चांद लग गए थे।

“ताज्जुब है मौलाना——-” उन्होंने मेरे हाथ से माचिस लेते हुए कहा “आप आज भी दाढ़ी और बुर्के में यकीन रखते हैं”.

“जी नहीं. मैं यकीन वक़ीन कुछ नहीं रखता.

मेरा बस चले तो सारी दाढ़ियों और बुर्क़ों को चिल्लम में रख कर पी जाऊं,मुझे ऐसी लड़कियां बहुत अच्छी लगती है ”

(प्रोफेसर के साथ जो स्टूडेंट लड़की थी नरगिस) “मेरा शर्मीला सा इशारा नरगिस की तरफ था”

मगर यह ज़ालिम ज़माना यह समाज, यह…………यह कदम कदम पर दीवारें खडी करता है।

” प्रोफेसर:”यह आपके साथ कौन है” उन्होंने बीच की सीट के पुश्ते की तरफ झुकते हुए पूछा.

उनकी नज़र मुल्लायन (मुल्ला की बीवी) के बुर्के पर फ़िसल रही थी।

“मेरी शामत—–मेरी आफत—–मेरी परले सिरे की दकियानूसी बीवी।

“उन्होंने ज़रा सा मुड़ कर नरगिस की तरफ देखा, आंखों ही आंखों में कुछ इशारे हुए फिर वह बड़ी लिजाजत से बोले:-

“आप दिल चस्प आदमी हैं, अगर इजाजत हो तो हम उधर आ जाएं? उनका मतलब दरम्यान की खाली सीट से था।

“जी हां शौक से_______”उस वक़्त मुल्लायन ने ऐसी खूंखार नज़रों से मुझे घोरा था जिनकी कहरमानी नक़ाब की जाली फाड़े दे रही थी,

घुटने का एक थॉक़ा भी मेरी कोख में लगा था, लेकिन उतने ही में वह दोनों पास की सीट पर आ चुके थे। मुल्लायन ओर भी कोने में सिमट गई,

उसका बस चलता तो उस वक्त मुझे ही कच्चा चबा जाती। कम से कम ज़बान के बाण ज़रूर चलाती,

लेकिन खुदा भला करे मौलाना अशरफ अली थानवी रह. का, उनकी किसी किताब में उस ने पढ़ लिया है कि औरत की आवाज़ भी सतर है तो शायद इसीलिए एक अजनबी मर्द की मौजूदगी में ज़बान नहीं खोल सकती थी।

“बात यह है कि मौलाना, फरसुदा,पुराना और तंग नज़र समाज के खिलाफ मर्दाना बगावत किये बगैर हम ऊंचे नहीं उठ सकते.

हम दोनों आप ही की तरह मुसलमान हैं, हमें इस्लाम की सदाक़त पर अटल यकीन है लेकिन इस्लाम को बात बात में घसीट कर लाना मज़हब का अपमान है,

मज़हब मस्जिद और मंदिर के दायरे की चीज है, उसे वहीं रहना चाहिए, ज़माना हम से ग्लोबल इंसानी मूल्यों की मांग कर रहा है”

मास्टर साहब का लहजा बड़ा वज़नदार था। ” बिल्कुल बिल्कुल………..” मैं ने ज़ोरदार ताईद की, “मुल्यों और तहज़ीब ,

कल्चर और क़यामत……………..नहीं वह सकाफत वगैरह के अल्फाज़ मुझे बहुत अच्छे लगते हैं मगर मेरी मुश्किल यह है मास्टर साहब के बाज़ार में कोई ऐसी किताब नहीं मिलती जिसमें नए कल्चर के बुनियादी उसूल और नियम लिखे हुए हों,

मैं उन्हें सीखना चाहता हूं।वह मुस्कुराये__________ “अरे यह कौन सी मुश्किल है सब से पहला और अहम उसूल तो यहीं है कि दकियानूसी नैतिक अवधारणाओं को ज़हन से झटक दिजीए.

यह औरत गरीब को जानवरों की तरह बांध कर रखना, यह पर्दा, यह दाढ़ी इन सब चीजों के बारे में सभ्य समाज और पश्चिमी विकाशशील देशों का अमल आप के सामने है,

औरत और मर्द को शायद क़ुरान में भी एक दूसरे का लिबास कहा गया है, फिर यह कहाँ की शराफत होगी कि इन दोनों के मिलने झूलने पर पाबंदियां लगाई जाएं।” ” ठीक है जनाब,

मैं खुद भी बारहा इसी तरह सोचता हूँ_________मगर प्रोफेसर साहब !

हमारा दकियानूसी समाज तो क़दम क़दम पर रोड़े अटकाता है”.” समाज के ठोकर मार दीजिए “.”

मारी थी प्रोफेसर साहब, मगर अपना ही अंगूठा टूट गया, ज़ालिम समाज का कुछ नहीं बिगड़ा”.

नरगिस खिलखिला कर हंसी, प्रोफेसर साहब भी मुस्कुराये.”आप का मतलब” उन्होंने सवाल किया।

“अब क्या बताऊँ साहब, मेरी एक मौसेरे भतीजी है वह मुझे बहुत अच्छी लगती है,

एक बार हम दोनों सिनेमा चले गए थे वहां हमें एक गाना बहुत पसंद आया जो हीरोइन ने गाया था,

एक दिन उसके सब घर वाले कहीं गए हुए थे तो हम दोनों ने उसी गाने की नक़ल शुरू कर दी,

उतने में उसका बड़ा भाई आ गया, उसे बड़ा गुस्सा आया, मैं ने कहा भाई, गुस्सा मत करो,

हम तो सिर्फ नक़ल कर रहे थे, उस पर उसने एक बड़ी खराब बात कही, फिर वह टैश में आ कर अपनी बहन की ओर बढ़ा,

मैं ने उस मौके पर एक फ़िल्मी डायलॉग चेप दिया_______” ज़ालिम! तू हमें मार भी डाले तो हमारी मोहब्बत मरने वाली नहीं,

हमारे खून के एक एक बूंद से सदा यहीं आवाज़ आती रहेगी कि मोहब्बत अमर है प्रेम अमर है। इस डायलॉग बाज़ी को सुन कर वह आग बबूला हो गया और

फिर मुझे नहीं मालूम कितने चांटे और मुक्के उसने मुझे मारे,

बहुत पिट जाने के बाद मैं ने बे खयाली में उसके एक पंच मार दिया, उसके नतीजे में उसके दांत बाहर आ गए और फिर अदालत से मुझे एक महीने की सज़ा हुवी।

वह दोनों हंसे”वह आपकी मौसेरे भतीजी का भाई यकीनन जाहिल और गंवार होगा ” मास्टर जी ने इस अंदाज में कहा जैसे वह सच मुच् मेरे भी मास्टर हो,

सभ्य समाज और मोहज़्ज़ब लोगों में रोमांस और निजी मामलों में इस तंगदिली का कोई वुजूद नहीं, आखिर आप खुद सोचिए,इंसान के फ़ितरी( स्वभाविक)तकाज़ों के बहाव को रोकना ,

रगों के लिए कितना हानिकारक होगा, नई तहज़ीब इंसान को उसके पैदाइशी हक़ देती है, आज़ादी देती है, दुनिया की लज़्ज़ातों से लुत्फ उठाने का मौका देती है ”

“ज़िंदाबाद ज़िन्दाबाद” मैं अहमकों की तरह लहराया” आप जैसा मोहज़्ज़ब आदमी आज मुझे पहली बार मिला है_________जी हाँ ,

अब मैं समाज से बगावत करूँगा, फरसुदा सामाजिक बंधनों से बगावत करूँगा”.प्रोफेसर: “यकीनन कीजिए”______ मैं मशविरा दूंगा कि इस की शुरुआत इसी वक्त हो जाए.

” यह कहते हुए मास्टर साहब ने मुल्लायन के बुर्के पर बीसियों बार नज़र डाली थी।”क्यों नरगिस, क्या तुम भी मौलाना को यहीं मशवरा नहीं दोगी ? “”

हाँ मौलाना, हम सभी को मिलजुलकर तहज़ीब, संस्कृति औऱ कल्चर की ज़ुल्फ़ें संवारनी है, मुझे देखिए, अकेली सफर कर रही हूं, कौन मेरा क्या बिगाड़ लेगा “”

मैं……….मैं आप ही को देख रहा हूं मिस नरगिस……….! यह आपके बाज़ू कितने दिलकश हैं.” यह कहते हुए मैं ने उसके खुले बाज़ू को उंगलियों से छुआ,

वह चमक गई, मास्टर साहब ने भी बुरा सा मुंह बनाया।”यह आप क्या करते हैं_______” नरगिस मिनमिनाई।”क्या करता हूं ” मैं ने हैरत से आंखें चौड़ाई।”

आप लोग जो कुछ तालीम दे रहे हैं उसी पर अमल शुरू करता हूं_______क्या”_______मुझ से आप का मफ़हूम और मतलब समझने में गलती हुई? “”

नहीं नहीं” मास्टर जी ने दोस्ताना लहजे में कहा, समझने में आप ने गलती नहीं की,

मंशा यह है कि नई तहज़ीब में भी बे तकल्लुफी के कुछ दर्जे हैं जिन में तदरीज (gradually)का लिहाज रखना जरूरी होता है_______अभी आप और मिस नरगिस में बेतकल्लुफी नहीं है””हो जाएगी,

अभी मैं उनसे प्यार की मीठी मीठी बातें करूंगा तो हो जाएगी, वैसे मैं ने सुना है क्लब्स और बॉलरूम में नए नए मर्द नई नई लेडियों के बाजुओं में बाज़ू डाल कर डांस करते हैं,

अभी आप ही कह रहे थे कि फ़ितरी और भौतिक तकाज़ों के बहाव को रोकना रगो और पट्ठों का सत्यानाश कर देता हैउन्होंने तश्वीशनाक(चिंताजनक) नज़रों से मुझे घोरा,

शायद वह अपनी राय की समीक्षा करना चाहते थे, जो उन्होंने मेरे बारे में क़ायम की थी,मेरे चेहरे पर अब भी संजीदगी नहीं थी शायद हिमाक़त और मूर्खता ही के तूफान उमंड रहे थे।

“आप लोग अजीब हैं” मैं ने हैरत के अंदाज़ में कहा” अभी तो फरसुदा और पुराने मूल्यों औऱ ज़ालिम समाज से बगावत का पाठ पढ़ा रहे थे,

क्या इसका मतलब इतना ही था कि मुझे अपनी दाढ़ी मुंड कर बीवी का #बुर्का नोच डालना चाहिए.

“उन्होंने ने उलझन भरी नज़रों से एक दूसरे की तरफ देखा।”मिस नरगिस” मैं लहराया” आप सोचिए कि मर्दों के धैर्य और ज़ब्त(सेल्फ कंट्रोल) को चैलेंज देने वाला चुस्त,

फिट और सेमी न्यूड लिबास आप ने क्यों पहन रखा है_________यह चेहरे पर मैकअप और लबों को लिपस्टिक से क्यों पोत रखा है,

यह आप के बदन से परफ्यूम की भीनी भीनी खुशबू क्यों आ रही है_______और मास्टर साहब, आप भी सोचिए,

जब आप जैसा रोशन ख्याल और मॉडर्न इंसान उंगलियों का सिर्फ टच भी अपनी स्टूडेंट के बाज़ू पर बर्दाश्त नहीं कर सका______जबकि यह बाज़ू इसीलिए खुले रखे गए हैं कि देखने वाले उनसे क्षमता और ज़र्फ़ के अनुसार आँखे सेक सकें,

तो बताइए उस गरीब भाई को गाउदी और जाहिल कहने का आप को क्या हक़ है जिस ने फिल्मी गानों की नक़ल बर्दाश्त नहीं की थी.

“”आप निहायत 420 मालूम होते हैं”,मास्टर साहब भिन्ना गए, शर्म नहीं आती दाढ़ी लगा कर ऐसी बातें करते हैं।”

शर्म एक इज़ाफ़ी चीज़ है मास्टर साहब, आप को मिस नरगिस के साथ एडल्ट कॉमेडी फिल्म देखने में शर्म नहीं आएगी(यह दोनों पहले कोई ए सर्टिफिकेट मूवी देखने का प्रोग्राम बना रहे थे)

तो मैं आखिर दाढ़ी पर क्यों शरमाऊं_________माफ करना समाज के जितने भी दुश्मन आज तक मुझे मिले हैं वह सब आप ही की तरह नाज़ुक मिज़ाज थे,

उनकी भी यहीं ख्वाहिश और चाहत थी कि मैं अपनी बीवी का बुर्का नोच फेंकू __ लेकिन जब वही हक़ मैं ने इस्तेमाल करना चाहा जो वह खुद इस्तेमाल करना चाहते थे तो वह बिखर गए,

मरने मारने पर उतर आए______क्या यह भी नए कल्चर का कोई बुनियादी क़ायदा है?”आप पत्थर के दौर की विचारधारा वाले हैं, अय्याश हैं, खुदगर्ज हैं.

“उनकी आवाज़ में शोले लपक रहे थे चेहरा मारे ताऊ के लंबोतरा हो गया था।”कमाल है साब” मैं अचंभे की शान क़ायम रखते हुए बड़बड़ाया”

आप एक ही चीज को काला भी कह रहे हैं और सफ़ेद भी। अय्याशी तो नए कल्चर का बुनियादी ढांचा है फिर उसे आप तारीक ख्याली कैसे कह सकते हैं।

उनके चेहरे पर ऐसे आसार थे कि शायद हाथ छोड़ दें,

मगर मुझे कोई फिक्र नहीं था क्योंकि उनके बाज़ुओं का कस बल पहले ही टोल चुका था,

बहुत होता तो बस यह होता कि पहले ही वार में वह एक दो हाथ मार देते मगर उसके बाद उन्हें सांस लेने की मोहलत भी शायद ही मिलती,

अचानक वह दोनों यहां से उठ कर अपनी पहली जगह पर जा बैठे ”

डिअर मास्टर! माचिस प्लीज् ?

मैं मुस्कुराया।उन्होंने बोखला कर माचिस मेरी तरफ फेंक दी।

“आप खफा हो गए जनाब” मैं लिजाजत से बोला, जबकि बंदा तो आप का स्टूडेंट बनने को पूरी तरह तैयार है”.

“शट अप” वह तड़खे “लेडीज़ की मौजूदगी में लड़ाई भड़ाई शाइस्तगी के खिलाफ है वरना……. वरना……””हाँ हाँ वरना क्या________आप पसंद करे तो मेरी पत्नी और मिस नरगिस बाथरूम में चली जाएगी,

फिर आप मुझे खिड़की से बाहर फेंक दीजीएगा”.चुप रहो” वह गला फाड़ कर चीखे, नरगिस की आंखों में खौफ झांक रहा था, मुल्लायन का टेम्प्रेचर शायद 110 हो ,

वह कई बार कोहनी और घुटने की ज़ुबान से मुझे चुप रहने का हुक्म दे चुकी थी, मगर जुनून की इस बहाव को मैं क्या करता जो कभी कभी मेरी खोपड़ी में काली नागिन की तरह लहराती है,

मेरा दिल चाह रहा था कि कम से कम एक टक्कर मास्टर जी से ज़रूर हो और उन्हें यह समझा सकूँ कि जबड़े पर पड़े हुए एक फौलादी पंच से बढ़ कर सच्चा आर्ट कोई नहीं।लेकिन गाड़ी एक स्टेशन पर रुकी और वह दोनों उतर गए और उतर कर वह किसी दूसरे कंपार्टमेंट में जा बैठे होंगे।

डिब्बा खाली हो गया।अब मुल्लायन का घुटा हुवा तूफ़ान उबला, गाड़ी चलते ही उसने नक़ाब उलट दिया, आंखे शोले बरसा रही थी रुखसार लाल भभुका थे।

हाय मेरे अल्लाह, आप का दिमाग आखिर किस प्रकार का है, नोज ऐसा गैर जिम्मेदार कोई हो ”

………..(कान में रूई डाल लो…… इसका चलता रहेगा…..)

खत्म।

-(साभार:मस्जिद से मैखाने तक) – Mufti Siraj Sidat