सुल्तान जलालुद्दीन ख़्वार्ज़मशाह मिंगबर्दी !

 सुल्तान जलालुद्दीन ख़्वार्ज़मशाह मिंगबर्दी !

चंगेज़ खान एक बहुत क्रूर और कुशल मोगल सम्राट था, जिसने अपनी युद्ध कौशलता से सन 1206 से 1227 के बीच एशिया,

अफ्रीका और यूरोप के अधिक हिस्से पर जिसका क्षेत्रफल लगभग 3 करोड़ 30 लाख वर्ग किलोमीटर था अपनी हुकुमत स्थापित कर ली थी।

चंगेज़ खान और उसकी सेना जिस जगह से भी गुज़रती थी अपने पीछे तबाही और बर्बादी की कई कहानियां छोड़ जाती थी।

चंगेज़ ख़ान के ख़तरनाक रथ पर सवार मंगोल मौत और तबाही के हरकारे थे…..

और देखते ही देखते शहर, इलाक़े और देश उनके आगे झुकते चले गए.

महज़ कुछ दशकों के अंदर ख़ून की होली खेलते, खोपड़ियों की मीनार खड़ी करते,

हँसते-बसते शहरों की राख उड़ाते चंगेज़ ख़ान के जनरल बीजिंग से मॉस्को तक फैली सल्तनत के मालिक बन गए.

चंगेज़ खान को ज़िंदगी में सिर्फ एक बार हार का मुंह देखना पड़ा,

और यह शिकस्त खेवा के आखिरी युवान सुल्तान जलालुद्दीन ख़्वार्ज़म शाह मंगबर्नी के हाथों हुई।

जब सारे सुल्तान, राजा,महाराजा,  और बादशाह चंगेज़ खान से भागते फिर रहे थे तब बस एक नवजवान योद्धा अपनी छोटी सी फौज ले कर चंगेज़ खान से टक्कर ले रहा था,

चंगेज़ी लश्कर के सामने आहनी चट्टान बन कर खड़ा था।

सच में वह ‘वन मेन आर्मी ‘ था।

चंगेज़ खान ने हार के बाद पूरी तवज्जो जलालुद्दीन की तरफ कर दी और अपने तीनों बेटों समेत जलालुद्दीन के पीछे हाथ धो कर पड़ गया।

और लाखों क्रूर योद्धाओं के साथ जलालुद्दीन पर आक्रमण और उसका पीछा करता रहा।

सुल्तान जलालुद्दीन के पास सिर्फ सात सौ फौजियों की टुकड़ी रह गई था,

वह भारत के नवनिर्वाचित सुल्तान अल्तमश के पास मदद और कुमक मांगने के लिए जा रहा था,

उन्होंने सिंध नदी के किनारे पड़ाव डाला हुआ था कि अचानक एक सुबह चंगेज़ खान की टिड्डी दल फौज ने सुल्तान की मुठ्ठी भर फौज पर हमला कर दिया,

तातारी लश्कर ने कमान की शक्ल में सुल्तान को घेर लिया.

आगे मंगोल दानवों की फौज और पीछे मौज मारता दरिया…

उस मुठ्ठी भर फौज ने बहुत ही बहादुरी और वीरता से मंगोल सेना का मुकाबला किया, जी तोड़ लड़े,मगर कब तक ……!!

छह सौ (600) साथी शहीद हो गए, बाकी बचे बस “सौ” …. मगर सुल्तान जलालुद्दीन जिस बहादुर और निडरता से लड़ा,

और लड़ाई में जो जोहर दिखाए,

चंगेज़ खान के दिल पर उसकी हिम्मत और बहादुरी का सिक्का बैठ गया।

मंगोल सेना जलालुद्दीन को ज़िंदा पकड़ना चाहती थी …

सुल्तान ने अपना ताज लिया, घोड़ा बदला और चंगेज़ खान कुछ समझ पाए उससे पहले पहाड़ नुमा चोटी से घोड़ा दरिया में कूदा दिया और

अपने सुल्तान के अनुकरण में बाकी सिपाहियों ने भी बुलंदी से भयावह तेजधार बहते पानी में घोड़े डाल दिए।

दश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम ने

बहरे जुलुमात में दौड़ा दिए घोड़े हम ने

मंगोल सेना ने तीरों की बारिश कर दी,जिससे अक्सर सिपाही जामे शहादत नोश कर गए,

सिर्फ सुल्तान और छह साथी उस रौद्र स्वरूप दरिया और दुनिया की सबसे खतरनाक फौज से बचते बचाते दूसरे किनारे पार लगे।

सुल्तान ने किनारे पर जा कर अपना नेजा गाढ़ा और उस पर अपना ताज रखा, भीगे कपड़े बदल कर सुखाने डाल दिए,

और आराम से एक पत्थर पर सर रख कर सो गया!!!

चंगेज़ खान उस पार से यह सब हैरानी से देख रहा था,अचानक बोला:

“यह अगर मेरा बेटा होता तो मैं पूरा विश्व जीत लेता”

फिर सारे शहज़ादों,सरदारों और कमांडरों को जमा करके कहा:

मैं ने आजतक ऐसा बहादुर और हिम्मत वाला शख्स नहीं देखा,

उसके हमराही भी उसी की तरह है बे नज़ीर बहादुर हैं,

इतने बड़े और खतरनाक दरिया को इस तरह मौत के साये में पार करना भी उन्हीं का हौसला है।

चंगेज़ खान इस युवान योद्धा की वीरता और शूरता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने अपने दरबारियों से कहा कि मेरे मरने के बाद भी दुनिया इस वीर की शूरता की दाद देगी,

और फिर महान शासक चंगेज़ खान ने अपने सबसे बड़े शत्रु का पैंटिंग बनवा कर इतिहास में अमर कर दिया,

मगर अफसोस के हम में से अक्सर लोग इस अज़ीम हीरो को नहीं जानते।